करंट विज़न संवाददाता
इटावा।
जनपद के विकास खंड बढ़पुरा के अंतर्गत ग्राम अलियापुर में उस समय माहौल भक्तिमय और गर्व से भर गया, जब ग्रामीणों और गणमान्य नागरिकों ने क्षेत्र के गौरव, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय श्री विजय बहादुर सिंह यादव के ‘निर्माण दिवस’ पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उच्च प्राथमिक विद्यालय परिसर में आयोजित इस कार्यक्रम में वक्ताओं ने उनके जीवन को त्याग, तप और राष्ट्रभक्ति की अमर गाथा बताया। वक्ताओं ने उनके जीवन संघर्ष पर प्रकाश डालते हुए बताया कि 11 जुलाई 1921 को जन्मे विजय बहादुर सिंह ने 1939 में ब्रिटिश भारतीय सेना की मेडिकल कोर जॉइन की थी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब देश को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पुकार सुनाई दी, तो उन्होंने 15 फरवरी 1942 को ब्रिटिश हुकूमत का साथ छोड़ दिया और आजाद हिंद फौज के सिपाही बन गए। 1942 से 1945 तक वे देश की आजादी के लिए सक्रिय रहे। जुलाई 1945 में गिरफ्तारी के बाद उन्हें रंगून, पेंगू, असम और दिल्ली की जेलों में रखा गया। देशभक्ति का मार्ग छोड़ने के लिए उन्हें तीन-तीन घंटे तक बिजली के झटकों (विद्युत ताप) से झुलसाया गया, लेकिन इस वीर सपूत ने उफ तक नहीं की। 1946 में रिहा होने के बाद भी उन्होंने चैन की सांस नहीं ली और राष्ट्र निर्माण में जुट गए। आजादी के बाद कई लोग पदों की लालसा में थे, वहीं श्री यादव ने 1951 से 1969 तक पंचायत राज विभाग में सहायक विकास अधिकारी के रूप में कार्य कर ग्रामीण उत्थान की नींव रखी। उनका मानना था कि असली भारत गांवों में बसता है और गांवों का विकास ही सच्ची राष्ट्रसेवा है। श्रद्धांजलि सभा में उनके ज्येष्ठ पुत्र वीरेंद्र सिंह यादव (पूर्व खंड विकास अधिकारी), भतीजे अवधेश कुमार यादव, प्रपौत्र प्रदीप यादव, जिला पंचायत सदस्य गौरव यादव, ग्राम प्रधान बलवीर सिंह यादव, पंकज यादव, महेंद्र यादव, दलबीर सिंह उर्फ भुल्लन दादा, अवनीश यादव पिंटू, लाखन सिंह यादव, हरिओम सविता नंदवंशी (जिला अध्यक्ष OBC मोर्चा), जितेंद्र सिंह, इंद्रेश कुमार, रणवीर सिंह, निशान सिंह यादव, पिंटू यादव, कमलेश कुमार, कौशल किशोर यादव, योगेंद्र यादव फौजी, इंजीनियर जयदेव यादव, मुकेश यादव, नवीन और प्रवीन यादव सहित बड़ी संख्या में क्षेत्रवासी मौजूद रहे। कार्यक्रम के अंत में संकल्प लिया गया कि विद्यालय के छात्र-छात्राएं उनके आदर्शों को आत्मसात करेंगे। वक्ताओं ने कहा कि स्वतंत्रता केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि उन तपस्वियों की विरासत है जिन्होंने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
