करंट विजन संवाददाता इमरान खान
*हाफ़िज़ कैफ़ रज़ा साहब* ने रमज़ान के मुक़द्दस महीने के अवसर पर एक अत्यंत प्रभावशाली संदेश जारी किया है। उन्होंने रोज़े की वास्तविक रूह (आत्मा) को समझाते हुए कहा कि रोज़ा सिर्फ पेट का नहीं, बल्कि इंसान के पूरे अस्तित्व और उसके चरित्र का होना चाहिए।
*रोज़े की व्यापक परिभाषा*
हाफ़िज़ साहब ने अपने संदेश में स्पष्ट किया कि इस्लाम में रोज़ा रखने का मतलब केवल खान-पान का त्याग करना नहीं है। उन्होंने इसके विभिन्न आयामों पर ज़ोर देते हुए कहा:
*नज़र का रोज़ा:* हम अपनी आँखों की हिफाज़त करें और कुछ भी अनैतिक या बुरा देखने से बचें।
*कानों का रोज़ा:*अपनी सुनने की शक्ति का सही इस्तेमाल करें और बुराई, गीबत (चुगली) या फालतू बातों को सुनने से परहेज़ करें।
*हाथ और पैरों का रोज़ा:** हमारे हाथों से किसी का बुरा न हो और हमारे कदम कभी भी गलत रास्ते की तरफ न उठें।
*ज़हन और नीयत का रोज़ा:** सबसे महत्वपूर्ण हमारी नीयत और विचार हैं। अगर हमारी सोच और नीयत पाक है, तभी रोज़ा मुकम्मल है।
“रोज़ा भूखा रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह अपनी ज़बान, अपने कान, अपने हाथ-पैर और यहाँ तक कि अपनी नीयत को भी बुराई से पाक रखने का नाम है।” *हाफ़िज़ कैफ़ रज़ा*
*समाज के लिए संदेश*
हाफ़िज़ कैफ़ रज़ा साहब ने ज़ोर देकर कहा कि रोज़ा हमें अनुशासन और मानवता सिखाता है। यदि हम रोज़ा रखकर भी अपने व्यवहार और नीयत में बदलाव नहीं लाते, तो हम रोज़े के असली मक़सद से दूर हैं। उन्होंने अपील की कि इस पाक महीने में हर इंसान अपने भीतर के इंसान को जगाए और हर अंग से इबादत करे।
