रमज़ान का महीना इबादत और तक़वा अख्तियार करने का है
करंट विज़न संवाददाता
फफूंद (औरैया) । रमज़ान के मुक़द्दस महीना का आज पांचवा रोजा है। यह वह बरकतों भरा महीना है जिसमें अल्लाह तआला ने ईमान वालों पर रोज़े फ़र्ज़ किए हैं ताकि वे तक़वा (परहेज़गारी) अपनाएँ और अपनी ज़िंदगी को अल्लाह के हुक्म के मुताबिक ढाल सकें। कुरआन शरीफ़ में साफ़ तौर पर फरमाया गया है कि रोज़ा तुम्हारे ऊपर इसलिए फ़र्ज़ किया गया है ताकि तुममें परहेज़गारी पैदा हो। रमज़ान के मुक़द्दस महीने की फज़ीलत बताते हुए आस्ताना आलिया समदिया मिसबाहिया के मौलाना सैय्यद मुजफ्फर चिश्ती ने कहा कि रोजा इंसान को बुराइयों और गुनाहों से बचाता है । रोज़ा केवल भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं है बल्कि यह अपने नफ़्स पर क़ाबू पाने, सब्र करने और खुद का हिसाब लेने का अभ्यास है। जब एक मुसलमान सुबह से लेकर शाम तक खाने-पीने और दूसरी ख्वाहिशों से खुद को रोकता है तो दरअसल वह अपने रब के हुक्म की तामील कर रहा होता है। रोज़ा इंसान को यह एहसास दिलाता है कि अल्लाह हर हाल में उसे देख रहा है। आज हमें खुद से यह सवाल करना चाहिए कि क्या हम सच में रोज़े की रूह को समझ पा रहे हैं । क्या हम सिर्फ़ रस्म निभा रहे हैं या अपने किरदार और आदतों में भी बदलाव ला रहे हैं । अगर हमारी ज़बान झूठ, चुगली और बुरे अल्फ़ाज़ से नहीं रुक रही अगर हमारे हाथ और दिल दूसरों को तकलीफ़ पहुँचा रहे हैं तो हमें अपने रोज़े के मक़सद पर फिर से सोचने की ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि हदीस शरीफ़ में आया है कि रोज़ा एक ढाल है। ढाल इंसान को बुराइयों और गुनाहों से बचाती है। जब कोई बंदा सच्चे दिल से रोज़ा रखता है तो वह अपने ईमान को मज़बूत करता है और गुनाहों से दूर रहने की कोशिश करता है। यही ढाल उसे दुनिया की बुराइयों और आख़िरत की सज़ा से महफ़ूज़ रखने का ज़रिया बनती है।रमज़ान का मुक़द्दस महीना हमें सब्र, शुक्र और हमदर्दी का पाठ पढ़ाता है। जब हमें भूख और प्यास का एहसास होता है तो हमें उन लोगों की तकलीफ़ समझ में आती है जो साल भर तंगी में जीते हैं। यही एहसास हमें ज़कात, सदक़ा और ज़रूरतमंदों की मदद की तरफ़ प्रेरित करता है और समाज में भाईचारा और मोहब्बत को बढ़ावा देता है। आइए इस मुक़द्दस महीने को सिर्फ़ एक रस्म न बनाकर अपनी ज़िंदगी में असली बदलाव का ज़रिया बनाएँ। नमाज़ की पाबंदी करें, कुरआन की तिलावत को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएँ अपने अख़लाक़ को बेहतर करें और दूसरों के हक़ का ख़याल रखें। अगर हमने रमज़ान को सही मायनों में गुज़ार लिया तो यक़ीनन यह महीना हमारी दुनिया और आख़िरत दोनों को संवार देगा। अल्लाह तआला हम सबको रमज़ान की बरकतों से पूरा फ़ायदा उठाने और सच्चे दिल से रोज़े रखने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन।
